नवरात्रि के नौवें और आखिरी दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। देवी सिद्धिदात्री को मां सरस्वती का भी एक रूप माना जाता है क्योंकि माता अपने सफेद वस्त्र एवं अलंकार से सुसज्जित अपने भक्तों को महाज्ञान एवं मधुर स्वर से मन्त्र-मुग्ध करती है। सिद्धिदात्री मां की पूजा के बाद ही अगले दिन नवमी मनाई जाती हैं।

मान्यतायों के अनुसार ब्रह्माण्ड  को रचने के लिए भगवान् शिव को शक्ति देने के कारण माँ भगवती का नाम  सिद्धिदात्री पड़ा। माँ सिद्धिदात्री ही भगवान् शिव के अर्धनारीश्वर रूप को पूर्ण करती हैं माँ दुर्गा के इस स्वरुप के साथ ह़ी नवरात्र के अनुष्ठान का समापन हो जाता हैं।

माँ सिद्धिदात्री के मंत्र:

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

अष्टमी, नवमी तिथि:

इस बार अष्ठमी 12 अप्रैल 2019 दिन शुक्रवार को सुबह 10:18 बजे से 13 अप्रैल दिन शनिवार को सुबह दिन में 08:16 बजे तक होगी उसके बाद नवमी तिथि लग जाएगी। 13 अप्रैल दिन शनिवार को महानवमी का व्रत होगा क्योंकि 13 अप्रैल को सुबह 08:16 बजे के बाद ही नवमी तिथि लग जाएगी जो 14 अप्रैल की सुबह 6 बजे तक ही विद्यमान रहेगी।

नवमी तिथि सिद्धिदात्री की पूजा:

माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति सिद्धिदात्री हैं इसलिए नवरात्र-पूजन के नौवें दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती हैं। नवमी के दिन सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है। दुर्गा मईया जगत के कल्याण हेतु नौ रूपों में प्रकट हुई और इन रूपों में अंतिम रूप है देवी सिद्धिदात्री का हैं। देवी प्रसन्न होने पर सम्पूर्ण जगत की रिद्धि सिद्धि अपने भक्तों को प्रदान करती हैं। देवी सिद्धिदात्री का रूप अत्यंत सौम्य है, देवी की चार भुजाएं हैं दायीं भुजा में माता ने चक्र और गदा धारण किया है, मां बांयी भुजा में शंख और कमल का फूल है।

मां सिद्धिदात्री कमल आसन पर विराजमान रहती हैं, और मां की सवारी सिंह हैं। देवी ने सिद्धिदात्री का यह रूप भक्तों पर अनुकम्पा बरसाने के लिए धारण किया है। देवतागण, ऋषि-मुनि, असुर, नाग, मनुष्य सभी मां के भक्त हैं। देवी जी की भक्ति जो भी हृदय से करता है मां उसी पर अपना स्नेह लुटाती हैं। मां का ध्यान करने के लिए आप “सिद्धगन्धर्वयक्षाघरसुरैरमरैरपि सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी” मंत्र से स्तवन कर सकते हैं।

नवमी देवी सिद्धिदात्री की पूजा विधि:

सिद्धियां हासिल करने के उद्देश्य से जो साधक भगवती सिद्धिदात्री की पूजा कर रहे हैं उन्हें नवमी के दिन निर्वाण चक्र का भेदन करना चाहिए। दुर्गा पूजा में इस तिथि को विशेष हवन किया जाता है और हवन से पूर्व सभी देवी दवाताओं एवं माता की पूजा करनी चाहिए। हवन करते वक्त सभी देवी दवताओं के नाम से हवि यानी अहुति देनी चाहिए उसके बाद में माता के नाम से अहुति देनी चाहिए। दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोक मंत्र रूप हैं अत:सप्तशती के सभी श्लोक के साथ आहुति देनी चाइए। देवी के बीज मंत्र “ऊँ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नम:” से कम से कम 108 बार आहुति दें।

नवमी नवरात्र के वस्त्र का रंग एवं प्रसाद:

नवरात्र में माँ सिद्धिदात्री की पूजा में आप हलके बैंगनी रंग के वस्त्रों का प्रयोग कर सकतेहैं। यह दिन चंद्रमा से सम्बंधित पूजा के लिए सर्वोत्तम माना गया है। नवरात्रि की नौवें दिन तिल का भोग लगाकर ब्राह्मण को दान दें। इससे मृत्यु भय से राहत मिलती है और अकस्मात होने वाली घटना -दुर्घटना से भी बचाव होता होता हैं।

मां सिध्दिदात्री की पूजा का महत्व:

मां का ये रूप सिध्दि प्रदान करने वाला है। और मां के इस रूप की साधना करने से सभी सिध्दियों की प्राप्ति होती है। मां के इस रूप की उपासना करने से सभी भौतिक और आध्यात्मिक सुखों की प्राप्ति भी होती है।

सिद्धिदात्री की स्तोत्र पाठ:

कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।

स्मेरमुखी शिवपत्नी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता।

नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥

परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।

परमशक्ति, परमभक्ति, सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।

विश्व वार्चिता विश्वातीता सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।

भव सागर तारिणी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी।

मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

कवच

ओंकारपातु शीर्षो मां ऐं बीजं मां हृदयो।

हीं बीजं सदापातु नभो, गुहो च पादयो॥

ललाट कर्णो श्रीं बीजपातु क्लीं बीजं मां नेत्र घ्राणो।

कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै मां सर्व वदनो॥

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *